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क्या मधुमक्खियां भी मुस्कुराती हैं? उनके चेहरे के छोटे-छोटे संकेत खोल सकते हैं उनके ‘मन’ के राज

सिडनी: इंसान अक्सर सामने वाले के चेहरे के भाव देखकर समझ लेते हैं कि वह खुश है, परेशान है या किसी चीज को पसंद नहीं कर रहा है। स्वादिष्ट भोजन मिलने पर मुस्कान आ जाती है, पसंद न आने वाली चीज पर चेहरा सिकुड़ जाता है। लेकिन क्या ऐसा ही कुछ छोटे-से शरीर वाली मधुमक्खियों के साथ भी होता है?

एक नए अध्ययन ने इस सवाल को नई दिशा दी है। वैज्ञानिकों का कहना है कि मधुमक्खियों के मुंह के अंगों की गतिविधियां उनके अंदर चल रही शारीरिक स्थिति और उनकी पसंद-नापसंद के बारे में संकेत दे सकती हैं। यह खोज इस बहस को भी नया आधार देती है कि क्या कीटों में किसी प्रकार की चेतना या आंतरिक अनुभव मौजूद हो सकता है।

यह अध्ययन प्रतिष्ठित शोध पत्रिका ‘प्रोसींिडग्स आॅफ द नेशनल एकेडमी आॅफ साइंसेज’ में प्रकाशित हुआ है। डार्विन ने भी उठाया था सवाल
जीव वैज्ञानिक चार्ल्स डार्विन ने बहुत पहले यह विचार रखा था कि केवल मनुष्य ही नहीं, बल्कि अन्य जीवों के हावभाव भी उनकी आंतरिक स्थिति को व्यक्त कर सकते हैं।

हम अपने आसपास के जानवरों को देखकर अक्सर समझ लेते हैं कि वे खुश हैं, डर रहे हैं या उन्हें दर्द हो रहा है। कुत्ते का पूंछ हिलाना, बिल्ली का व्यवहार या किसी जानवर की शारीरिक मुद्रा हमें उसके मनोभावों का अंदाजा देती है। वैज्ञानिकों ने स्तनधारी जीवों में इस तरह के संकेतों का लंबे समय तक अध्ययन किया है। शोधों से पता चला है कि नवजात इंसानों और चूहों के बच्चों में भी मीठे और कड़वे स्वाद पर चेहरे की प्रतिक्रियाएं मिलती-जुलती हो सकती हैं। मीठे स्वाद पर दोनों में होंठ चाटने जैसी प्रतिक्रिया देखी गई, जबकि कड़वे स्वाद पर मुंह सिकोड़ने जैसी प्रतिक्रिया सामने आई।

अब वैज्ञानिकों ने यह जानने की कोशिश की कि क्या इतने अलग शरीर और मस्तिष्क वाले जीव—जैसे कीट—भी अपने अनुभवों के कोई संकेत दे सकते हैं। कठोर चेहरे के पीछे छिपी प्रतिक्रियाएं मधुमक्खियों का चेहरा इंसानों की तरह भाव दिखाने वाला नहीं होता। उनका बाहरी शरीर कठोर खोल से ढका होता है, इसलिए पहली नजर में लगता है कि उनके चेहरे पर कोई बदलाव संभव नहीं होगा।

लेकिन वैज्ञानिकों का ध्यान उनके मुंह के बेहद सक्रिय हिस्से ‘ग्लोसा’ पर गया। यह एक लंबी जीभ जैसी संरचना होती है, जिसकी मदद से मधुमक्खियां फूलों से रस चूसती हैं। चीन की सदर्न मेडिकल यूनिर्विसटी में किए गए प्रयोगों में शोधकर्ताओं ने भौंरों (बम्बलबी) को अलग-अलग स्वाद वाली छोटी-छोटी बूंदें दीं और उनकी प्रतिक्रियाओं को ध्यान से देखा।

ठा मिला तो खत्म होने के बाद भी रहा ‘स्वाद का एहसास’जब एक मधुमक्खी को चीनी का घोल दिया गया तो उसने तेजी से अपनी ग्लोसा बाहर निकाली और उसे पी लिया। लेकिन हैरानी तब हुई जब घोल खत्म हो गया और उसे देने वाली पाइपेट हटा ली गई। इसके बाद भी मधुमक्खी कुछ समय तक अपनी ग्लोसा को बाहर निकालती और अंदर करती रही, जैसे वह स्वाद का आनंद ले रही हो।

यह प्रतिक्रिया वैज्ञानिकों के लिए बेहद दिलचस्प थी, क्योंकि यह केवल भोजन लेने की सामान्य प्रक्रिया जैसी नहीं लग रही थी। नमकीन स्वाद पर बदली प्रतिक्रिया इसके बाद वैज्ञानिकों ने उसी मधुमक्खी को हल्का नमकीन पानी दिया। मधुमक्खी ने पहले उसे चखा, लेकिन इसके बाद उसने सिर हिलाया और अपनी ग्लोसा को साफ करने लगी। उसका व्यवहार ऐसा था जैसे वह उस स्वाद को पसंद नहीं कर रही हो।

वैज्ञानिकों ने यह भी जांचना चाहा कि कहीं यह प्रतिक्रिया केवल चीनी और नमक की रासायनिक प्रकृति के कारण तो नहीं है। इस सवाल का जवाब खोजने के लिए शोधकर्ताओं ने मधुमक्खियों की शारीरिक स्थिति बदली। उन्होंने कुछ मधुमक्खियों को थोड़े समय के लिए 40 डिग्री सेल्सियस तापमान में रखा। इससे उन्हें कोई नुकसान नहीं हुआ, लेकिन वे ऐसी स्थिति में पहुंच गईं जैसे गर्म दिन में सक्रिय रहने के बाद उन्हें पानी की जरूरत हो।

इसके बाद जब इन मधुमक्खियों को हल्का नमकीन पानी दिया गया तो उनकी प्रतिक्रिया बदल गई। उन्होंने उसे उत्साह से पिया और वही ग्लोसा गतिविधियां दिखाईं जो पहले मीठे घोल के बाद दिखाई थीं। इससे वैज्ञानिकों ने निष्कर्ष निकाला कि मधुमक्खियों की प्रतिक्रिया केवल स्वाद की वजह से नहीं थी, बल्कि उनकी शारीरिक जरूरत और आंतरिक स्थिति से भी प्रभावित हो रही थी।

मस्तिष्क के रसायनों से भी बदली प्रतिक्रिया शोधकर्ताओं ने मधुमक्खियों के तंत्रिका तंत्र में काम करने वाले कुछ रसायनों के प्रभाव का भी अध्ययन किया। उन्होंने पाया कि आॅक्टोपामाइन और डोपामाइन जैसे न्यूरोमॉड्यूलेटर्स देने से चीनी के प्रति उनकी प्रतिक्रिया में बदलाव आया। वहीं, एक अन्य रासायनिक प्रणाली एंडोकैनाबिनॉयड के प्रभाव से घोल पीने के बाद ग्लोसा बाहर निकालने की गतिविधि बढ़ गई।

यह संकेत मिला कि मधुमक्खियों का व्यवहार केवल बाहरी पदार्थों पर निर्भर नहीं करता, बल्कि उनके शरीर के अंदर चल रही प्रक्रियाएं भी उसे प्रभावित करती हैं। क्या मधुमक्खियां भावनाएं महसूस करती हैं? हालांकि वैज्ञानिक इस अध्ययन के आधार पर यह नहीं कहते कि मधुमक्खियां मनुष्यों की तरह खुशी, दुख या पसंद-नापसंद जैसी भावनाएं महसूस करती हैं। लेकिन उनका कहना है कि यह शोध इस धारणा को चुनौती देता है कि कीट केवल स्वचालित प्रतिक्रिया देने वाली छोटी मशीनें हैं।

अध्ययन के अनुसार, मधुमक्खियों की प्रतिक्रियाएं उनकी आंतरिक शारीरिक अवस्था से जुड़ी हुई दिखाई देती हैं और यह उनके किसी प्रकार के व्यक्तिगत अनुभव की ओर संकेत कर सकती हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि मधुमक्खियों के इन छोटे-छोटे ‘चेहरे के संकेतों’ को समझना संभव हो रहा है, तो भविष्य में कीटों की दुनिया, उनके व्यवहार और उनके संभावित आंतरिक अनुभवों को जानने के लिए नए रास्ते खुल सकते हैं। एक छोटी-सी मधुमक्खी के चेहरे की हल्की-सी हरकत शायद हमें यह समझने में मदद कर सकती है कि प्रकृति में चेतना कितने अलग-अलग रूपों में मौजूद हो सकती है।

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